Suvendu Durga Puja controversy
मार्क्सवादी साहित्य और पत्रिकाओं के स्टॉल को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने वाम दलों पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि दुर्गापूजा के दौरान कम्युनिस्टों के बुक स्टॉल के बाहर ‘दुर्गापूजा’ शब्द लिखा जाना चाहिए। यदि उसकी जगह केवल ‘शारदोत्सव’ लिखा जाता है, तो पूजा समितियों को ऐसे स्टॉल की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
विधानसभा में पूजा समितियों से अपील करते हुए शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि तथाकथित वामपंथी विचारधारा से जुड़े कुछ लोग सनातनियों और भगवा विचारधारा को निशाना बनाते हैं। उन्होंने कहा कि दुर्गापूजा के दौरान कम्युनिस्टों द्वारा लगाए जाने वाले बुक स्टॉल पर ‘दुर्गापूजा’ की जगह ‘शारदोत्सव’ लिखा जाए तो ऐसे स्टॉल की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उनके बयान का मुख्य संदेश यह था कि दुर्गापूजा को केवल एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसके धार्मिक स्वरूप को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।
पश्चिम बंगाल में लंबे वाम शासन के दौरान दुर्गापूजा पंडालों के बाहर मार्क्सवादी साहित्य और पत्रिकाओं के स्टॉल लगाने की परंपरा काफी लोकप्रिय थी। पूजा की भीड़ के बीच इन स्टॉलों के जरिए लोगों से संपर्क बनाने और पार्टी की विचारधारा का प्रचार करने का प्रयास किया जाता था।
2011 के बाद इस तस्वीर में काफी बदलाव आया। अब ज्यादातर पूजा पंडालों के बाहर पहले की तरह बड़े सीपीएम बुक स्टॉल नजर नहीं आते। हालांकि, कोलकाता समेत कुछ चुनिंदा जगहों पर अभी भी ऐसे स्टॉल लगाए जाते हैं, जहां मार्क्सवादी साहित्य, राजनीतिक किताबें और पत्रिकाएं उपलब्ध रहती हैं।
1954 में पार्क सर्कस में मुजफ्फर अहमद की पहल पर दुर्गापूजा के दौरान पहली बार बुक स्टॉल लगाए जाने की शुरुआत हुई थी। बाद में यह वामपंथी राजनीति और साहित्य से जुड़ी एक पहचान बन गई। आज भी पार्क सर्कस में वामपंथी साहित्य और पत्रिकाओं के स्टॉल लगाए जाते हैं।
इसी परंपरा को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने अब राजनीतिक बहस छेड़ दी है। उनका कहना है कि किताबें बेचने या विचारधारा का प्रचार करने पर उन्हें आपत्ति नहीं है। लेकिन दुर्गापूजा के दौरान स्टॉल लगाया जा रहा है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह दुर्गापूजा के अवसर पर लगाया गया है।
‘शारदोत्सव’ शब्द के जरिए दुर्गापूजा की धार्मिक पहचान को अलग रखने की कोशिश को लेकर शुभेंदु ने वाम दलों पर ‘दोहरी नीति’ का आरोप लगाया है। उनके बयान के बाद बंगाल में धर्म, संस्कृति और राजनीति के बीच संबंध को लेकर बहस फिर तेज हो सकती है।