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Ajit Doval Mizoram Sikkim

मिजोरम से सिक्किम तक: अजित डोभाल के खुफिया करियर का महत्वपूर्ण अध्याय

मिजोरम के विद्रोह के दौरान अजित डोभाल की खुफिया भूमिका उनके करियर के सबसे चर्चित अध्यायों में रही। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने लालडेंगा के सात प्रमुख कमांडरों में से छह को भारतीय पक्ष के संपर्क में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं सिक्किम का भारत में विलय एक व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रिया थी।

मिजोरम से सिक्किम तक: अजित डोभाल के खुफिया करियर का महत्वपूर्ण अध्याय

Ajit Doval Mizoram Sikkim

Published by: cloud_hindi
  • Posted:September 24, 2026 7:05 am
  • Update:September 24, 2026 7:05 am
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भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का शुरुआती खुफिया करियर उत्तर-पूर्व भारत से गहराई से जुड़ा रहा। मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के विद्रोह के दौरान उनकी भूमिका को लेकर कई कहानियां सामने आती रही हैं। बाद में सिक्किम के भारत में विलय से जुड़े घटनाक्रम में भी उनका नाम विभिन्न रिपोर्टों में आया।

हालांकि, इतिहास को केवल एक अधिकारी की गुप्त कार्रवाई के रूप में देखना सही नहीं होगा। मिजोरम और सिक्किम दोनों मामलों में राजनीतिक नेतृत्व, खुफिया एजेंसियों, सेना और स्थानीय राजनीतिक ताकतों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

लालडेंगा का विद्रोह और मिजोरम में डोभाल

1959 के आसपास मिजोरम में बांस के बड़े पैमाने पर फूलने के बाद खाद्य संकट पैदा हुआ। इसे ‘मौताम’ के नाम से जाना जाता है। इसी दौर में लालडेंगा के नेतृत्व में Mizo National Famine Front बना, जिसका नाम बाद में Mizo National Front यानी MNF कर दिया गया।

1966 में MNF ने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया और भारत से अलग मिजो राष्ट्र की मांग उठाई। विद्रोह को दबाने के लिए भारतीय सेना को तैनात किया गया। भारतीय वायुसेना ने भी विद्रोहियों के ठिकानों पर कार्रवाई की।

अजित डोभाल ने 1968 में केरल कैडर के IPS अधिकारी के रूप में करियर शुरू किया। 1972 में वह Intelligence Bureau में शामिल हुए। इसके बाद मिजोरम उनका एक प्रमुख खुफिया कार्यक्षेत्र बना।

विभिन्न जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार, 1972 से 1977 के बीच डोभाल ने आइजोल में IB के Subsidiary Intelligence Bureau का नेतृत्व किया। इस दौरान उनके लंबे समय तक गुप्त पहचान के साथ काम करने की बात भी सामने आती है।

उनके करियर से जुड़ी सबसे चर्चित कहानी MNF नेतृत्व के भीतर संपर्क स्थापित करने की है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, लालडेंगा के सात प्रमुख कमांडरों में से छह को भारतीय पक्ष के साथ संवाद के लिए तैयार करने में डोभाल की भूमिका थी। इससे MNF की संगठनात्मक शक्ति कमजोर हुई।

मिजोरम शांति प्रक्रिया की नींव

डोभाल का मिजोरम कार्यकाल 1970 के दशक में समाप्त हुआ, लेकिन उस समय बनाए गए संपर्क और राजनीतिक प्रक्रिया आगे भी प्रभावी रहे।

लालडेंगा अंततः भारत सरकार के साथ बातचीत के रास्ते पर आए। 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान मिजो शांति समझौता हुआ और लालडेंगा बाद में मिजोरम के मुख्यमंत्री बने।

हालांकि, 1986 के समझौते को केवल डोभाल की व्यक्तिगत उपलब्धि बताना इतिहास को सरल बना देना होगा। यह कई वर्षों के राजनीतिक संघर्ष, सैन्य कार्रवाई और बातचीत के बाद संभव हुआ।

डोभाल के मिजोरम अभियान की खासियत यह बताई जाती है कि उन्होंने केवल सैन्य शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय खुफिया जानकारी और व्यक्तिगत संपर्कों के माध्यम से विद्रोही नेतृत्व के भीतर प्रभाव बनाने की कोशिश की।

सिक्किम भारत का हिस्सा कैसे बना?

सिक्किम के भारत में विलय की कहानी मिजोरम से अलग थी। 1950 के समझौते के तहत सिक्किम का आंतरिक प्रशासन चोग्याल के पास रहा, जबकि रक्षा और विदेश नीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

1970 के दशक की शुरुआत में सिक्किम में राजशाही के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन तेज हुआ। लोकतंत्र समर्थक और भारत के साथ नजदीकी संबंध चाहने वाली राजनीतिक ताकतें मजबूत हुईं।

इस दौरान R&AW भी सिक्किम में सक्रिय हुआ। पूर्व R&AW अधिकारी जी. बी. एस. सिद्धू के संस्मरणों पर आधारित विवरण के अनुसार, 1973 में वह एक छोटी R&AW टीम के साथ गंगटोक पहुंचे। उनका काम स्थानीय राजनीतिक दलों से संपर्क करना और लोकतंत्र तथा भारत के साथ विलय के समर्थक राजनीतिक समूहों को सहयोग देना था।

1974 के चुनाव में काजी ल्हेंदुप दोरजी के नेतृत्व वाली सिक्किम कांग्रेस को जीत मिली। इसके बाद राजशाही की शक्तियों को काफी सीमित कर दिया गया।

1975 में सिक्किम में जनमत संग्रह हुआ। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 59,637 वोट राजशाही समाप्त कर भारत में शामिल होने के पक्ष में पड़े, जबकि 1,496 वोट इसके खिलाफ थे। इसके बाद भारतीय संसद ने संविधान का 36वां संशोधन पारित किया और 16 मई 1975 को सिक्किम भारत का 22वां राज्य बन गया।

इसलिए सिक्किम के भारत में विलय को केवल अजित डोभाल की व्यक्तिगत खुफिया कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से पर्याप्त नहीं है। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में R&AW अधिकारी जी. बी. एस. सिद्धू की भूमिका विशेष रूप से दर्ज है।

वहीं, मिजोरम में डोभाल की भूमिका उनके शुरुआती खुफिया करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। लालडेंगा के नेतृत्व को कमजोर करने और उसके छह प्रमुख कमांडरों को भारतीय पक्ष के साथ संपर्क में लाने की कहानी उनके करियर के सबसे चर्चित अध्यायों में शामिल है।

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