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India BrahMos Belt

ब्रह्मोस के ‘चक्रव्यूह’ में घिरता ड्रैगन! ASEAN बेल्ट में भारत की रणनीति से बढ़ी चीन की चिंता

दक्षिण चीन सागर में भारत की ‘ब्रह्मोस बेल्ट’ रणनीति चीन के लिए नई चुनौती बन सकती है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया के बाद मलेशिया और थाईलैंड भी ब्रह्मोस खरीद सकते हैं। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर के मुताबिक, यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं बल्कि भारत की बढ़ती क्षेत्रीय रक्षा साझेदारी का नेटवर्क है।

ब्रह्मोस के ‘चक्रव्यूह’ में घिरता ड्रैगन! ASEAN बेल्ट में भारत की रणनीति से बढ़ी चीन की चिंता

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Published by: cloud_hindi
  • Posted:September 9, 2026 2:36 pm
  • Update:September 9, 2026 2:36 pm
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दक्षिण चीन सागर में भारत सीधे सैन्य मौजूदगी बढ़ाने के बजाय ASEAN देशों के साथ रक्षा सहयोग मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है। फिलीपींस के बाद वियतनाम और इंडोनेशिया ने भी ब्रह्मोस खरीदने के समझौते किए हैं। अब मलेशिया और थाईलैंड के भी इस सूची में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

ASEAN देशों के हाथों में ब्रह्मोस, चीन की बढ़ी चिंता

दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर ASEAN क्षेत्र के कई देशों में चिंता है। ऐसे में भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस इन देशों की तटीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकती है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ‘Taiwan Talks’ को दिए एक हालिया इंटरव्यू में रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर ने इस रणनीति पर चर्चा की। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य केवल चीन को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि एक मजबूत क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क तैयार करना भी है।

फिलीपींस के बाद वियतनाम और इंडोनेशिया

2022 में फिलीपींस ने अपनी तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लगभग 375 मिलियन डॉलर में ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदी थीं। इसके बाद वियतनाम और इंडोनेशिया ने भी भारत के साथ ब्रह्मोस खरीदने के समझौते किए।

मलेशिया और थाईलैंड के भी भविष्य में इस सूची में शामिल होने की संभावना है। इससे दक्षिण चीन सागर के आसपास कई देशों की तटीय रक्षा क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हो सकती है।

इनमें से कई देशों का चीन के साथ दक्षिण चीन सागर की समुद्री सीमाओं को लेकर विवाद है। ऐसे में भारत की रक्षा साझेदारी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है।

‘ब्रह्मोस बेल्ट’ कोई सैन्य गठबंधन नहीं

पीआर शंकर के अनुसार, ‘ब्रह्मोस बेल्ट’ किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का नाम नहीं है। यह उन देशों के साथ भारत की बढ़ती रक्षा साझेदारी का नेटवर्क है, जिनके चीन के साथ समुद्री विवाद हैं।

उनका मानना है कि चीन ब्रह्मोस की क्षमता से पहले ही परिचित हो चुका है। ऐसे में दक्षिण चीन सागर के अलग-अलग हिस्सों में ब्रह्मोस से लैस देशों की मौजूदगी बीजिंग के लिए नई रणनीतिक चुनौती पैदा कर सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस की बढ़ी मांग

ब्रह्मोस भारत की प्रमुख सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके इस्तेमाल के बाद इस हथियार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिलचस्पी बढ़ने की बात कही जा रही है।

भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित ब्रह्मोस की प्रमुख विशेषताओं में इसकी तेज गति और सटीक हमला करने की क्षमता शामिल है। तटीय रक्षा में इसका इस्तेमाल किसी देश को समुद्री खतरों के खिलाफ मजबूत प्रतिरोधक क्षमता प्रदान कर सकता है।

दक्षिण चीन सागर इतना महत्वपूर्ण क्यों?

दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इस जलमार्ग से होकर गुजरता है।

चीन इस समुद्री क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है। इसी को लेकर वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के साथ उसका लंबे समय से विवाद है।

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र में अपनी गश्त और समुद्री गतिविधियां भी बढ़ाई हैं। ऐसे में तटीय देशों के लिए अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करना प्राथमिकता बन गया है।

सीधे टकराव के बजाय साझेदार देशों के जरिए रणनीतिक दबाव

भारत की रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसे सीधे दक्षिण चीन सागर में सैन्य टकराव में उतरने की आवश्यकता नहीं है। क्षेत्रीय साझेदार देशों की रक्षा क्षमता मजबूत करके अप्रत्यक्ष रणनीतिक दबाव बनाया जा सकता है।

अगर दक्षिण चीन सागर के आसपास ब्रह्मोस से लैस देशों का नेटवर्क मजबूत होता है, तो यह चीन के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती बन सकता है। औपचारिक सैन्य गठबंधन के बिना भी ऐसी रक्षा साझेदारी बीजिंग की रणनीतिक गणनाओं को जटिल कर सकती है।

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