• 7 November 2026
  • Saturday
ad
ad
पीयूष गोयल यूरोप जलवायु नीति

बर्लिन में पीयूष गोयल ने यूरोप की जलवायु नीति पर उठाए सवाल

बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु संकट की ऐतिहासिक जिम्मेदारी यूरोप के विकसित देशों पर डाली। उन्होंने जलवायु वित्त के वादे और भारतीय उत्पादों पर CBAM के तहत अतिरिक्त कार्बन टैक्स की भी आलोचना की।

बर्लिन में पीयूष गोयल ने यूरोप की जलवायु नीति पर उठाए सवाल

पीयूष गोयल यूरोप जलवायु नीति

Published by: cloudtv-newsroom
  • Posted:October 24, 2026 7:51 pm
  • Update:October 24, 2026 7:51 pm
  • Facebook
  • Telegram
  • X
  • Whatsapp

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 में यूरोप की जलवायु नीति की आलोचना की। पर्यावरण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने जलवायु संकट की ऐतिहासिक जिम्मेदारी यूरोप के विकसित देशों पर डालते हुए भारत के उत्सर्जन, जलवायु वित्त और कार्बन बর্ডर एडजस्टमेंट मेकैनिज्म (CBAM) का मुद्दा उठाया।

भारत और यूरोप के उत्सर्जन पर तुलना

गोयल ने कहा कि भारत की आबादी दुनिया की 17 प्रतिशत है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान 3 प्रतिशत से भी कम है। उनके अनुसार, यूरोप की आबादी दुनिया की 3 से 4 प्रतिशत है, जबकि ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय देशों का कार्बन उत्सर्जन काफी अधिक रहा है।

उन्होंने कहा कि 140 करोड़ लोगों के भोजन, ऊर्जा और सुरक्षा की जिम्मेदारी के बावजूद भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम चला रहा है। गोयल के मुताबिक, भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन यूरोप की तुलना में 7–8 गुना कम है।

जलवायु वित्त के वादे का मुद्दा

2015 के पेरिस समझौते का उल्लेख करते हुए गोयल ने कहा कि विकसित देशों ने गरीब देशों को हर साल 100 अरब डॉलर का जलवायु वित्त देने का वादा किया था। उन्होंने दावा किया कि यह वादा पूरा नहीं हुआ।

जलवायु संकट की जिम्मेदारी पर चर्चा के दौरान गोयल ने पूछा कि बड़ी मात्रा में कार्बन वातावरण में किसने छोड़ा। एक पैनलिस्ट की टिप्पणी के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना का निशाना यूरोप है।

CBAM पर भारत की आपत्ति

गोयल ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाला यूरोप अब भारत के स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट पर CBAM के जरिए अतिरिक्त कार्बन टैक्स लगा रहा है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था विकासशील देशों पर अतिरिक्त दबाव डालती है।

सम्मेलन में भारत, यूरोप के विकसित देशों और अमेरिका से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

More Stories